हेमवती नंदन बहुगुणा की जयंती पर देवभूमि मानव संसाधन विकास ट्रस्ट ने किया भावपूर्ण स्मरण

देहरादून:- आज देश के महान नेता रहे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री व पूर्व केंद्रीय मंत्री व सत्तर से 80 के दशक के अंत तक विपक्ष की राजनीति के महत्वपूर्ण ध्रुव रहे स्वर्गीय हेमवती नंदन बहुगुणा की 103 वीं जयंती के अवसर पर देवभूमि मानव संसाधन विकास ट्रस्ट ने ईसी रोड स्थित ट्रस्ट के कार्यालय में धर्मनिरपेक्षता व एच एन बहुगुणा विषय पर विचार गोष्ठी आयोजित कर उनको श्रद्धांजलि अर्पित की।

इस अवसर पर ट्रस्ट के अध्यक्ष व वरिष्ठ कांग्रेस नेता सूर्यकांत धस्माना ने सबसे साथियों सहित पहले घंटाघर स्थित श्री बहुगुणा की मूर्ति पर मालार्पण कर उनको श्रद्धासुमन अर्पित किए। तत्पश्चात ट्रस्ट कार्यालय ईसी रोड में आयोजित गोष्ठी को संबोधित करते हुए बहुगुणा जी को आज़ाद भारत का नेहरू व इंदिरा के बाद का सबसे बड़ा धर्मनिरपेक्ष नेता बताया।

उन्होंने बहुगुणा जी के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उत्तराखंड के गढ़वाल संभाग के पौड़ी जिले में ख़िरसु ब्लॉक के बुघाणी गांव में कानून गो रेवतीनंदन बहुगुणा के घर 25 अप्रैल 1919 में जन्में हेमवती नंदन बहुगुणा अपनी प्रारंभिक शिक्षा ख़िरसु व माध्यमिक शिक्षा देहरादून के डीएवी कॉलेज से करने के बाद उच्च शिक्षा के लिए इलाहाबाद चले गए ।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में स्नातक में प्रवेश लेते ही बहुगुणा छात्र राजनीति में शामिल हो गए और वहीं से राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल हो गए। देश की आज़ादी के आंदोलन का ऐसा रंग चढ़ा कि हेमवती नंदन पर अंग्रेजी सरकार ने जिंदा मुर्दा दस हज़ार रुपये इनाम रख दिया। बहुगुणा गिरफ्तार हो कर जेल गए व महीनों तक जेल में रहे। जेल से रिहा होने के बाद देश की आज़ादी तक स्वतंत्रता संग्राम में नेहरू व लाल बहादुर शास्त्री जैसे राष्ट्रीय नेताओं के संपर्क में आये व देश की आज़ादी के बाद हुए पहले विधानसभा चुनावों में इलाहाबाद से चुन कर विधानसभा पहुंचे और फिर संसदीय सचिव से लेकर उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री तक की यात्रा फिर सीएफडी का गठन उसका जनता पार्टी में विलय फिर देश के पेट्रोलियम मंत्री फिर वित्त मंत्री फिर कांग्रेस में अल्प समय के लिए वापसी और फिर कांग्रेस से व लोक सभा से त्यागपत्र व ऐतिहासिक उप चुनाव लोकदल में अध्यक्ष के रूप में और फिर लोकदल का विभाजन पूरा एक इतिहास है। 17 मार्च 1989 को अमरीका में हार्ट सर्जरी के दौरान उनकी मृत्यु हो गयी।

स्वर्गीय बहुगुणा के साथ बिताए अनुभवों को किया साझा

श्री धस्माना ने श्री हेमवती नंदन बहुगुणा जी के 1981 में संपर्क में आने से लेकर उनकी मृत्यु तक के अनेक संस्मरण सुनाए।उन्होंने कहा कि लगभग सात आठ वर्षों में श्री बहुगुणा जी के सानिध्य में जो राजनैतिक संस्कार हमें मिले वो हमारी सबसे बड़ी पूंजी है । उन्होंने कहा की उनका सबसे बड़ा गुण व्यक्तिगत रूप से एक पक्का कर्मकांडी ब्राह्मण होते हुए राजनेता के रूप में एक सच्चा धर्मनिरपेक्ष नेता होना था और शायद उनकी मृत्यु पर देश के प्रसिद्द स्तम्भकार खुशवंत सिंह ने उनको श्रद्धांजलि देते हुए एक लेख लिखा जिसमें उन्होंने कहा कि आज़ाद भारत में नेहरू के बाद का सबसे बड़ा धर्मनिरपेक्ष नेता देश ने खो दिया। श्री धस्माना ने बताया कि बहुगुणा जी ने एक बार गढ़वाल दौरे के दौरान अपने गांव बुघाणी में जहां वे उनके साथ रात्रि प्रवास में रुके थे अपने मुख्यमंत्रित्व काल का रोचक किस्सा सुनाया, हुआ यूं कि राजधानी लखनऊ में उनको एक पुल का उद्धघाटन करना था , बहगुणा जी समय पर कार्यक्रम स्थल पहुंच गए जहां विभाग के मुख्य अभियंता सहित राज्य के प्रमुख अधिकारी मौजूद थे , बहुगुणा जी का काफिला जैसे ही कार्यक्रम स्थल पर रुका उनकी गाड़ी के दरवाजे पर मुख्य अभियंता लपक कर पहुंचे और बहुगुणा जी से बोले सर दो तीन मिनट गाड़ी में ही रुकें, बहुगुणा जी ने कारण पूछा तो वे बोले पंडित जी दो मिनट में पहुंच जाएंगे , बहुगुणा जी ने पूछा पंडित जी का क्या काम तो मुख्य अभियंता बोले सर पूजा तो वे ही करेंगे इस पर बहुगुणा जी बोले तो क्या मौलवी पादरी और ग्रंथि पहुंच गए, बहुगुणा जी के इस सवाल से मुख्य अभियंता बगलें झांकने लगे और बहुगुणा जी गाड़ी से उतरे उद्धघाटन स्थल पर लगे रिबन को काट कर उद्धघाटन कर दिया बिना किसी धार्मिक क्रियाक्लाप के ।

बहुगुणा जी ने कहा कि फिर सचिवालय पहुंच कर बाकायदा यह आदेश जारी कर दिया कि राज्य के किसी भी कार्यक्रम में कोई धार्मिक क्रियाक्लाप नहीं होगा क्योंकि राज्य सबका है और राज्य का अपना कोई धर्म नहीं वो धर्मनिरपेक्ष है और सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वो इस धर्मनिरपेक्षता की रक्षा करे यही शपथ हम लेते हैं जब हम सरकार के रूप में संविधान की शपथ लेते हैं। दूसरी ओर मैंने स्वयं श्री हेमवती नंदन बहुगुणा जी को श्री बद्रीनाथ जी में विष्णु सहस्त्रनाम अनुष्ठान करते देखा है। बद्रीनाथ जी में एक सभा में जब उन्होंने अपना संबोधन आदि गुरु शंकराचार्य को स्मरण कर उनके द्वारा भारत में चार धामों की स्थापना और बद्रीनाथ धाम की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए शुरू किया तो ऐसा लगा जैसे कोई शास्त्रों का प्रकांड विद्वान प्रवचन कर रहा हो। उनके इस व्यक्तिगत स्वरूप और एक राजनेता के स्वरूप का अनुसरण आज शायद ही कोई नेता कर रहा हो। श्री धस्माना ने कहा कि भारत के वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य में आज की वास्तविक आवश्यकता है भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को बचाने के लिए राजनेताओं में इस प्रकार की धर्मनिरपेक्षता की आवश्यकता है।

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